Tuesday, July 7, 2026

विश्वगुरू को आख़िर हुआ क्या है...

मोक्ष पथगामी










हिंदू धर्म में मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति बताई जाती है। मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मा को शरीर त्यागना पड़ता है, इसे ही हम मृत्यु कहते हैं। ग्रंथों में मोक्ष प्राप्ति के कई मार्ग बताए गए हैं। भागवत गीता में ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग को मोक्ष का मार्ग बताया गया है। साधारण शब्दों में, कर्म योग अर्थात कर्म करते जाओ फल की चिंता छोड़ कर जैसे– पढ़ाई करो मगर रोज़गार की चिंता छोड़ कर, नौकरी करो मगर वेतन की चिंता छोड़कर आदि। ज्ञान योग अर्थात जो राजा कहे वह सत्य बाकी सब मोहमाया। भक्ति योग अर्थात भक्ति में इतना लीन हो जाओ कि कोई तुम्हारा सर्वस्व लूट ले पर आपको इसका कोई अफसोस ना हो। इस प्रकार आत्मा को परमात्मा में लीन करना या निष्काम कर्म करना, वर्षों तक कठिन तपस्या और फिर भगवान से वरदान प्राप्त करना या भगवान की मर्जी मानकर संसार के सभी दुःख सहना और बदले में भगवान को अपनी भक्ति अर्पित करना आदि ही मोक्ष मार्ग है।

एक प्रसिद्ध मार्ग और भी है, संसार में इतना पाप करो कि आपके संहार के लिए भगवान को अवतार लेना पड़े और आप उनके हाथों मर कर मोक्ष प्राप्ति करें। सामर्थ्यवान व्यक्ति इस प्रसिद्ध मार्ग को अपनाता है। सारे हथकंडे आजमाकर जीते जी सुख प्राप्त करो और भगवान के हाथों मरकर मोक्ष।

कली काल में आर्यावर्त के स्वयंभू राजा जो स्वघोषित अजीव (नॉन–बायोलाजिकल) हैं और उनके दरबारी दिनरात राष्ट्र हित में तुच्छ प्रजा को मोक्ष प्राप्ति के नित्य नए अवसर प्रदान करने का अमोघ यज्ञ कर रहे हैं। लोगों को भक्ति मार्ग पर बनाए रखने के लिए सभी आधुनिक उपाय किए जा रहे हैं। सांसारिक सुखों की आसक्ति से विरक्ति के लिए सबसे पहला कदम शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन ताकि शिक्षा व्यक्ति को अनासक्त भक्ति की ओर ले जाए। दूसरा कदम, आमजन के धन अर्जित करने के सभी साधनों को कम कर भौतिक सुख के मोहपाश को काटना आदि। आपसी प्रेम और भाईचारा लोगों को सांसारिक सुख की ओर आकर्षित करते हैं। आर्यावर्त के स्वघोषित "अजीव" राजा और उनके दरबारियों के सबसे अहम कदम, समाज में व्याप्त प्रेम और भाईचारे जैसे अनुचित सांसारिक क्रियाओं की समाप्ति के लिए कठिन साधना कर रहे हैं। इनके इस पुनीत कार्य में राजकीय संरक्षण प्राप्त ऋषि–मुनियों द्वारा सभी पापों का स्वयं वरण कर आमजन को सुरक्षित किया जा रहा है। सभी मिलकर आम जन के जीवन को कठिनतम बनाने के लिए अथक कार्य कर रहे हैं ताकि लोगों का इस मर्तलोक/ मृत्युलोक से मोहभंग हो और वे मोक्ष को सहर्ष स्वीकार करें।

"यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः... अथ मर्त्योऽमृतो भवति।" (जब हृदय की सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब मनुष्य अमृतत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।)
~ कथा उपनिषद्, 2.3.14

कली के प्रभाव में आकर कुछ अज्ञानी मनुज आर्यावर्त के लोगों को सांसारिक सुख के दलदल में धकेलना चाहते हैं। वे उनके लिए वैज्ञानिक शिक्षा, रोजगार माँग करते हैं और प्रेम व भाईचारे का प्रसार करने का प्रयास कर रहे हैं। इन अज्ञानियों ने हमेशा विश्वगुरू आर्यावर्त के मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को अवरुद्ध किया है। इन दुष्टात्माओं को वश में करने और उन्हें निष्पाप बनाने का प्रयत्न भी "अजीव" प्रभु द्वारा निरन्तर किया जा रहा है। कुछ कपटी मनुष्य जो उनके प्रभाव को स्वीकार करते हैं वे निष्कलंक हो प्रभु के विशेष कृपापात्र होते हैं और जो मनुष्य उनके प्रभाव को स्वीकार नहीं करते उन्हें मोक्ष पथगामी बना दिया जाता है।

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