Sunday, August 5, 2012

जीवन की सीख

जीवन की राह में लगेंगे ठोकरें तो खूब,
पर, चलना संभल संभल कर तब ही तो सीख पाओगे.

        जब आएगा मुसीबत तब खाओगे तुम धोखे, 
        पर, यकीन खुद पे करना तब ही तो सीख पाओगे.


विपत्तियों में तेरे होगा साथ कोई,
मुसीबतों से लड़ना तब ही तो सीख पाओगे.

        कर स्वागत इन दुखों का, ये जीवन में आने - जाने हैं,
        फर्क अपनों - परायों में करना तब ही तो सीख पाओगे.

कर मदद तुम सभी की, इसमें कोई भेद कर,
देना किसी को खुशियाँ तब ही तो सीख पाओगे.

        माता - पिता की सेवा कर, गुरुजनों का आशीष ले,
                    जीवन के मुश्किल राहों पर तब ही तो चलते जाओगे.


                            # प्रभाकर कुमार 'सन्नी' #

Sunday, March 4, 2012

बेखबर

सुबह ७.३० बजे, पटना के प्राइम सड़क पर,
बेखबर शहर से वह,
बेखबर शहर के लोगों से,
बेखबर पास से गुजरते ऑटो, चमचमाती करों से वह,
बेखबर प्रदेश के विकास से, 
बेखबर हेमामालिनी के बिहार आगमन से वह,
बेखबर विकास पुरुष के वादों से,


पटना के प्राइम सड़क पर,
खबर उसे केवल अपनी जठराग्नि की,
खबर उसे बुझाने की,
चाहत है सिर्फ जीने की,


पटना के प्राइम सड़क पर,
बेखबर है बदलती दुनिया से वह,
बेखबर है दुनिया के रहनुमाओं से,
बेखबर है अपने भविष्य से वह,
बेखबर है अपने अतीत से, 
बेखबर है बाइबिल, कुरान से वह,
बेखबर है गीता, पुराण से,


पटना के प्राइम सड़क पर,
वह पत्तलों की ढेर में, निवालों की तलाश में,
चुन रहा है दानों को, पेट की आग बुझाने को,
यह साधारण भोजन नहीं है,
रईसों की पार्टियों में चखा जाने वाला आनाज,
एक - एक पत्तल में बचा सारा अनाज खा लेगा अकेले,
पास एक कुत्ता भी आपनी बारी के इंतजार में,


क्या यह वही देश भारत है,
क्या यह वही महान बिहार है,
क्या यह वही धरती है महापुरुषों की,
क्या इसी विकास की पहली बयार बही थी यहाँ से,
क्या पूर्वजों ने हमें यह मानवता विरासत में दी है,


तुम जियो अगर बेशर्म हो तुम, बेच सको हर चीज को,
देह बेचो, दिमाग बेचो,
ईमान बेचो, सम्मान बेचो,
बेटी बेचो, बेटा बेचो,
धर्म बेचो, मजहब बेचो,
जीवन और मरण भी बेचो,
है बाजार खुला हुआ यह,
तुम भी बिको, हमें भी बेचो . . .


                                          प्रभाकर कुमार 'सन्नी' 

Saturday, March 3, 2012

लहू का रंग एक है, आमिर क्या गरीब क्या


लहू का रंग एक है, आमिर क्या गरीब क्या,
बने है एक खाक से दूर क्या करीब क्या.
वही है तन वही है जान, कब तलक छिपाओगे 
पहन के रेशमी लिबास तुम बदल न जाओगे 
सभी हैं एक जाती हम सवर्ण क्या अवर्ण क्या 
लहू का रंग एक है . . . . . . 


जी एक है तो फिर न क्यों दिलों का दर्द बाँट लें,
जिगर का दर्द बाँट ले, लबों का प्यार बाँट लें,
खता है सब समाज की, भले - बुरे नसीब क्या,
लहू का रंग एक है . . . . . . .


कोई जने हैं मर्द तो कोई जनि है ओरतें,
शारीर में भले हो फर्क, रूह सबकी एक है,
एक हैं जो हम सभी, विषमता की लकीर क्या,
लहू का रंग एक है आमिर क्या गरीब क्या ? ? ?

Tuesday, January 17, 2012

आँखिन


आँखिन में प्रीतिरस, रीति सब आँखिन में

आँखिन में अक्षर लिखत हैं सुघराई के,

आँखिन में काम औ ढिठाई सब आँखिन में

आँखिन में सील बसै सुरिसरनाई के

आलम सुकवी कहै अमृत है आँखिन में

आँखिन में जगजोति दोई हैं सुहाई के

काम के ततच्छिन सब लच्छिन हैं आँखिन में

आँखिन में भेद हैं भलाई और बुराई के।

''रास्ता''


हैं! रास्ते तो खुब पर] मंज़िल का पता चाहिए]
निभायेंगे हम साथ] पर उनसे भी वफा चाहिए।
चले हैं जिस पथ में कई आयेंगे उस पर मोड  भी]
लगेंगे अगर कोई ठोकर] तो गिरकर संभलना चाहिए॥

चल पड े हैं राह में करके बुलंद हौसले]
इस अंधेरी राह में बस] जुगनु का सहारा चाहिए।

काँटे] गड्‌ढे] पत्थरें हैं] मार्ग में बिखरे बहुत पर]
थाम ले जो बांह ऐसा कोई साथी चाहिए॥

आँखें पत्थर] खून पानी] बुझ चुके हैं दीप सारे]
कर सके जो रोद्गानी ऐसी उम्मीद चाहिए।

आ गये किस मोड  प,े सूझता नहीं जब रास्ता]
दिखा जो दे राह] ऐसा कोई दोस्त चाहिए॥

बाँटों खुद्गिायाँ भूल कर गम] आज यहाँ हर किसी को]
बस खुद्गिायाँ ही खुद्गिायाँ चाहिए।

हैं रास्ते तो खुब पर] मंजि ल का पता चाहिए।

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''हमारा गाँव''



इतना प्यारा गाँव हमारा, ऐसी हो इसकी पहचान।
छोटा-बड़ा का भेद नहीं हो रहते हों सब एक समान॥

नहीं कहीं भी बैर भाव हो, नहीं कहीं भी हिंसा।
ना किसी का डर हो यहाँ, ना हो कल की चिंता॥

भारत की पहचान यही है, पलती जहाँ पर सभ्यता।
फूलों की खुद्गाबु हो इतनी, झूम उठे मन सबका॥

छोटों को जहाँ मिले प्यार, और बड ों को मिले सम्मान।
जहाँ वचन की खातिर लोग दे दें अपनी जान॥

द्गिाक्षित हों हर जन, परन्तु तनिक नहीं अभिमान हो।
चलें धर्म पर सभी, मगर थोड ा बहुत विज्ञान हो॥

ना हो हिन्दू,  ना हो मुस्लिम जहाँ सभी इंसान हो।
किसी धर्म का बंध नहीं हो, किसी जाति का नाम ना हो॥

मेहनत सबका धर्म हो और कर्म ही सबकी पूजा।
भाईचारे की भावना हो सबमें, ना कोई पराया ना ही दूजा॥

देश प्रेम की भावना ऐसी दिम में कुर्बानी की जज्बात हो।
कोई देखे नहीं कुदृष्टी से देद्गा को, ऐसी उनमें बात हो॥

सभी नारी हो सीता जैसी, पर लक्ष्मीबाई सी शान भी हो।
मान-मर्यादा पहचान हो उनकी, पर इंदिरा गाँधी सी आन भी हो॥

बस यही है सपना अपना . . . !

इतना प्यारा गाँव हमारा, ऐसी हो इसकी पहचान,
छोटा-बड ा का भेद नहीं हो रहते हों सब एक समान॥


@ प्रभाकर 'सन्नी' @

Monday, May 30, 2011

भ्रष्टाचारः मजबूरी या आदत!


एक ऐसा देद्गा जिसकी पहचान ही विविधता है। अलग-अलग मौसम, अलग रंग-रुप के लोग, उनकी अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म एवं समाज परन्तु अंतराष्ट्रीय स्तर पर सबकी एक पहचान, भारतीय। हमारा संविधान विद्गव का सबसे समृद्ध एवं विस्तृत संविधान है। भारत विद्गव का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला देद्गा भी है इसकी एक वहज यह भी हो सकती है कि यहाँ का पर्यावरण मानव के लिये सबसे उपयुक्त है। हमारा उद्येद्गय देद्गा की विद्गोषता बयां करना कतई नहीं है क्योंकि ये सारी विद्गोषतायें जगजाहिर है। हम आपको इन विद्गोषताओं के माध्यम से भ्रष्टाचार की जड  में ले जाना चाहते हैं।


भ्रष्टाचार दो शब्द 'भ्रष्ट' तथा 'आचार' से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है बुरा नियम अथवा कानून, परन्तु इसका भावार्थ बहुत ही व्यापक है। हमारे अनुसार हर वो कार्य जो केवल 'मैं' को ध्यान में रखकर किया जाये, भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार के दो मुखय स्वरुप है- पहला मजबूरी, दूसरा आदत।

भ्रष्टाचारः मजबूरी
देद्गा की जो विद्गोषतायें उपर वर्णित की गई हैं उन्हीं से कुछ मजबूरियों का जन्म होता है। मैं भारत के स्वर्णिम इतिहास से भलीभांति परिचित हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि भारत अपनी संस्कृति एवं विचार से कभी विद्गवगुरु कहा जाता था। कालान्तर में इन संस्कृतियों एवं विचारों से लचीलापन गायब हो गया एवं इनमें कट्रता का उदय हुआ। जिन संस्कृतियों एवं विचारों से समाज का हर सदस्य/वर्ग लाभान्वित होता था वही आज समाज में असमानतायें फैला रही हैं। और यहीं जन्म होता है भ्रष्टाचार का-

एक व्यक्ति ईमानदारी की कमाई से अपना घर-परिवार चलाता है, अपने बच्चों में अच्छे संस्कार एवं ईमानदारी के गुण विकसित करता है। उसकी बेटी की शादी उसके योग्य लड़के से इस कारण नहीं हो पाती है क्योंकि उसके पास दहेज में देने के लिये पैसे नहीं है। उसका बेटा इसलिये बेरोजगार हो गया क्योंकि वह पैसे के अभाव में अच्छी एवं गुणवत्ता पूर्ण द्गिाक्षा प्राप्त नहीं कर सका।

एक सरकारी मुलाजि अपने साहब के बच्चों की देखा-देखी अपने बच्चे को भी तथाकथित अच्छे विद्यालय में पढ ाना चाहता है जिसके लिये उसे वेतन से ज्यादा पैसों की आवद्गयकता है। कैसे आयेंगे ये पैसे? सिफारिद्गा, भ्रष्टाचार की जड  के लिये यह भी एक पोषक तत्व है। सिफारिद्गा से मजबूरी पैदा होता है, और फिर जन्म होता है भ्रष्टाचार का। खैर यह तो कुछ समाजिक कारण है अब मैं कुछ राजनैतिक मजबूरियों की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहता हूँ।

भ्रष्टाचार से सबसे अधिक प्रभावित होता है समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित एक गरीब, और अद्गिाक्षित परिवार जो केवल शोषित होता है। सरकार ने उनके लिये कुछ योजनायें चलाई है। निचले स्तर पर इन योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिन्हें सौंपी गई है, सरकार उन्हें भ्रष्टाचार करने के लिये मजबूर भी करती है। उदाहरण कई हैं परन्तु कुछ पर चर्चा करें-

आँगनबाड़ी कार्यकर्ता जिसकी जिम्मेदारियों का अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि इसे हर रोज  ४० छोटे बच्चों को चार घंटे अपने पास रखना है। उनके खेलकूद, व्यवहारिक द्गिाक्षा, पोषण एवं समुचित विकास का ध्यान रखना है, साथ ही गांव की अन्य महिलाओं एवं किद्गाोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना है। इन सभी कार्यों के लिये उसे महीने के १५०० रुपये दिये जाते हैं वह भी १०-१२ महीने के अंतराल पर। इससे ईमानदारी की अपेक्षा करना हमारी बेवकूफी है। 

हमारे देद्गा में, सांसद, विधायक, प्रधानमंत्री, मुखयमंत्री अथवा उपर स्तर के अन्य प्रतिनिधि, सभी को रहने के लिये घर, घूमने के लिये गाड ी, एवं खर्च करने के लिये मोटी रकम वेतन के रुप में दी जाती है जबकि पंचायत प्रतिनिधियों जो जनता के सबसे करीब हैं तथा जो वास्तव में जनता के दुख-सुख में शरीक होते हैं एवं समाज के विकास में जिनकी अहम भूमिका हो सकती है से अपेक्षा की जाती है कि वह इमानदारी पूर्वक, निःस्वार्थ भाव से मुफ् में समाज की दिन-रात सेवा करे। यह कोरे सपने मात्र हैं। 

जन वितरण प्रणाली का दुकानदार, जिसे सरकार द्वारा जिम्मेदारी दी गई है कि वह गरीबों को जीने के लिये सरकार के तरफ से अनाज का वितरण करे। उसे इस कार्य के लिये सरकार द्वारा कुछ कमीद्गान दिये जाते हैं जिसमें वह अपने परिवार का पेट तक नहीं भर सकता। उससे हमारी अपेक्षा होती है कि वह खुद सपरिवार भूखे रहकर अपने हाथों से दूसरों को अनाज बांटे। यह एक भ्रम मात्र है और कुछ नहीं। ऐसे कई उदाहरण हमारे आस-पास मौजूद हैं जो हमारे समाज एवं सरकारी तंत्र से मजबूर हैं, और भ्रष्टाचार करते हैं।


To be conti .........