लाठियाँ जो कभी बैसाखी बनकर सहारा देती हैं,
लाठियाँ जो खंभे बनकर संभालती हैं गरीबों की झोपड़ियाँ,
लाठियाँ जो गाँव मुहल्लों की हिफाजत करते चौकीदारों की सुरक्षा करती है,
लाठियाँ जो डोरी पर करतब दिखाती लड़की की संतुलन बनाती है,
लाठियाँ जो हर साल दशहरे और मुहर्रम पर भांजी जाती है लोगों के मनोरंजन के लिए,
वो लाठियाँ करेंगी बगावत,
जब लाठियाँ चलेंगी देश के नौनिहालों पर जब वे शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार मांगेंगे,
जब लाठियाँ चलेंगी देश के किसानों पर जब वे खून-पसीने से उगाये गए फसलों की कीमत मांगेंगे,
जब लाठियाँ चलेंगी नदियों और जंगलों के प्रहरियों पर जब वे उन्हें बचाने की गुहार करेंगे,
लाठियाँ बरसाने वाले वो बाजूएं भी करेंगी बगावत,
जब बाजूएं, अपने ही औलादों पर लाठियाँ बरसाने को मजबूर हो जाएंगी,
जब बाजूएँ, ताकत की रोटी उगाने वाले किसानों पर लाठियाँ बरसाने को मजबूर हो जाएंगी,
लाठियाँ करेंगी बगावत हुक्मरानों के खिलाफ,
बाजूएँ उट्ठेंगी इंकलाब के नारों के साथ,
पाँव उखड़ जाएंगे सियासतदारों के,
जब बाजूएँ और लाठियाँ मिलकर करेंगी बगावत।

बहुत ख़ूब और बहुत सही। तुम लाठियाँ चला कर भी खौफ़ के साये में हो और ये बच्चे लाठियाँ खाकर भी निडर बने हुए हैं।
ReplyDeleteबिल्कुल सही फरमाया आपने, तानाशाही की सबसे बड़ी निशानी है कि वो निहत्थे मगर निडर लोगों से डरती है।
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